दिल्ली में ठंड की पहली बयार आ चुकी होगी...
सुबह की हवा में अब वो हल्की-सी ठंड उतर आई होगी। शामें कुछ जल्दी ढलने लगी होंगी। सड़क किनारे चाय की भाप शायद अब थोड़ी ज्यादा अच्छी लगती होगी और भटूरे... वो अब पहले से थोड़ा जल्दी ठंडे हो जाते होंगे।
दिल्ली ऐसी ही है।
थोड़ी धूल, थोड़ा धुआँ, थोड़ा शोर और इन सबके बीच ढेर सारी ज़िंदगी।
कभी-कभी सोचता हूँ, अगर दिल्ली से उसका पॉल्यूशन निकाल दिया जाए, तो शायद यह भारत के सबसे खूबसूरत शहरों में से एक होगी।
लेकिन सच कहूँ तो अपनी धुंध और पॉल्यूशन के साथ भी दिल्ली कम प्यारी नहीं है।
क्योंकि दिल्ली सिर्फ एक शहर नहीं है।
दिल्ली वो जगह है, जहाँ कोई आपका नहीं होता, फिर भी किसी न किसी मोड़ पर कोई अपना-सा मिल जाता है।
पुरानी दिल्ली की गलियों में करीम्स का स्वाद, नटराज के दही भल्ले, जलेबी वाले की गर्म जलेबी, पराठे वाली गली की खुशबू...
ये चीज़ें सिर्फ खाई नहीं जातीं।
ये यादों में बस जाती हैं।
और फिर एक दिन आप दिल्ली छोड़ देते हैं।
सोचते हैं—अब सुकून मिलेगा, अब भीड़ नहीं होगी, अब इतना शोर नहीं होगा।
लेकिन शहर छोड़ने के बाद समझ आता है कि जिस शोर से भाग रहे थे, वही शोर कितना अपना था।
मेट्रो की भीड़, सड़क किनारे की चाय, अचानक मिलने वाला दोस्त, बिना मतलब की लंबी शामें...
सब याद आने लगता है।
जेब में सौ रुपये लेकर निकलना और मेट्रो के सहारे पूरी दिल्ली घूम आना...
रास्ते में हजारों अनजान चेहरे देखना, अलग-अलग भाषाएँ सुनना और फिर भी मन में यही महसूस होना—
“हाँ... ये शहर अपना है।”
अब कोई पूछे—
“तुम तो दिल्ली छोड़ आए थे न?”
हाँ।
छोड़ आया था।
लेकिन शायद दिल्ली मुझे छोड़कर नहीं गई।
मेरे अंदर कहीं रह गई।
शायद हम शहर नहीं छोड़ते...
हम बस अपना एक हिस्सा वहाँ छोड़ आते हैं।
इसलिए शायद किसी शहर की याद उसकी इमारतों से नहीं आती।
उम्मीद है दिल्ली अब भी वैसी ही होगी।
वक्त मिला तो फिर जाऊँगा।
दिल्ली घूमने नहीं...
बस उस दिल्ली से मिलने,

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