नफऱत करता हूँ मैं तुमसे
जब भी कुछ रोमांटिक लिखने का सोचता हूँ, सा...ला नफ़रत ही बाहर आती है। नफऱत इतनी भयंकर रूप से फ़ैल चुकी है कि कैंसर भी शायद इतना घातक नहीं होता होगा।
तुमने मुझे कैक्टस सा कर दिया है, और ख़ुद रेगिस्तान ना होकर, खारा समुंदर हो गयीं हो।
जानती हो मैं तुम्हें अब "तुम" नहीं कहना चाहता हूँ, बल्कि मैं तुम्हें "तू" कहके जलील करना चाहता हूँ। हर जगह "तू" लिखना चाहता हूँ।
मैं तुम्हें सिर्फ़ तुम्हारी ही नज़रों में गिरा हुआ देखना नहीं चाहता हूँ। मैं तुम्हें लोगों के नज़रों में गिरा दिखना चाहता हूँ। मेरी नज़रों से गिरे हुए तो तुम्हें एक वक़्त हो गया।
पहले मैं अकेला था जो तुमसे नफऱत किया करता था, अब ये फ़ोन , कीपैड भी तुम्हारे नाम को लिखने से साफ़ इनकार कर दिया करते हैं। तुम्हारा नाम टाइप करता हूँ तो साथ में गालियाँ सजेस्ट करते हैं।
पहले सिर्फ़ तुमसे नफ़रत होती थी। अब तुम्हारे नाम कि हर लड़की से मुझे नफ़रत होती है, और इसी के चलते ना जाने कितनी ही लड़कियों को ब्लॉक कर रखा है, जिन्हें मैं जानता तक नहीं हूँ। ये पागलपन है लेकिन मुझे इसी पागलपन का मज़ा है।
मैं एक शहर बसाना चाहता हूँ, जहाँ कोई भी ऐसा ना हो, जिसे देखकर तुम याद आओ, या जिसका नाम सुनकर तुम्हारी यादें मेरी दहलीज़ों को लांघकर मेरे बिस्तर तक आ जायें...चुभती हैं तुम्हारी यादे काँटो सी।
तुम एक रोग हो, ऐसा रोग जो सिर्फ़ मुझे हुआ है। इसका इलाज सिर्फ़ नफ़रत है। बेइंतिहा नफ़रत। नफ़रत दवाई का काम करती है...जबतक मैं तुमसे नफ़रत नहीं करता हूँ, एक अज़ीब से अवसाद से ग्रस्त रहता हूँ।
मुझे तुम्हारी आँखों से नफऱत होती है, तुम्हारी बातों से भी... अगर धोखे से कभी तुम्हारी आवाज़ सुनाई दे देती है, तो अनायास ही कान में किरकिरे शीशे की रगड़ाहट सी लगड़ी।
समझ रही हो ना...कितनी नफऱत करता हूँ मैं तुमसे..
ये मानसून में होने वाली बारिश के बाद जो धूप खिल कर, एक अज़ीब सी उमस पैदा करती है ना, उससे कहीं ज्यादा खतरनाक है..तुम इक दिन जल जाओगी इस नफ़रत की लपटों में। मैं अपना नफ़रात पाल रहा हूँ।
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